रविवार, 3 जुलाई 2016

छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस

अनिरुद्ध दुबे
छत्तीसगढ़ में बारिश के साथ आसमानी मौसम तो बदला ही है, राजनीतिक फिज़ां भी बदली-बदली सी नज़र आ रही है। पहले राजनीतिक खबरें भाजपा-कांग्रेस पर केन्द्रित रहा करती थीं अब एक और नया दल छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस (जोगी) सुर्खियों में है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी यदि कोई नई राजनीतिक इबारत गढ़ेंगे, वह सुर्खियों में तो रहेगी ही। जोगी के इस नये संगठन पर भाजपा एवं कांग्रेस के कद्दावर लोग अपने-अपने ढंग से सोच रहे हैं। हाल ही में भाजपा के बारनवापारा अभ्यारण्य में हुए चिंतन शिविर में बड़े नेताओं को चाय पानी के लिए जब-जब थोड़ा वक्त मिला, चर्चा में यह बात ज़रूर आई कि जोगी के नया संगठन खड़ा करने पर  किसकी सेहत पर कितना असर पड़ेगा। राजनीति पर गहन चिंतन करने वाले कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है कि यह भुलावे में नहीं रहना चाहिए कि 2018 के विधानसभा चुनाव में अजीत जोगी और उनका नया राजनीतिक दल केवल कांग्रेस के लिए घातक सिद्ध होगा, जहां ज़रूरत महसूस होगी उन सीटों पर जोगी खेमा भाजपा के उम्मीदवारों को भी नुकसान पहुंचाने में कोई कसर बाकी नहीं रखेगा। यदि जोगी का दल पांच-छह सीट भी जीत ले आया तो सरकार बनाने के समीकरण में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका तो हो ही जाएगी। बहरहाल श्रीमती रेणु जोगी को लेकर जो सस्पेंस बरकरार था उस पर से धुंध छंट चुकी है। कांग्रेस विधायक दल की बैठक में शामिल होकर श्रीमती जोगी ने संकेत दे दिया कि वे विधानसभा के मानसून सत्र में कांग्रेस विधायक दल की उपनेता वाली जगह पर ही बैठेंगी।

जोगी तेरी लीला न्यारी...
सावन का महीना लगने में अब ज्यादा वक्त नहीं। सावन के महीने में मंदिरों में खूब भजन कीर्तन चलता है। भगवान शंकर के बहुत से मंदिरों में यह पॉपुलर भजन सुना जा सकता है- जोगी तेरी लीला न्यारी, बम बम बम बम बम भोला...। अजीत जोगी की कार्य शैली पर गौर करें तो क्या वह कम न्यारी है। जोगी अलग-अलग समय पर जो राय बनाते रहे उस पर उन्हें बदलते देखा गया। जोगी जब मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने कहा था कि नेताओं को साठ साल के बाद राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए। यह अलग बात है कि आज वे सत्तर के करीब पहुंच रहे हैं और राजनीति के क्षेत्र में अब भी पूरा जी जान लगाए हुए हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव के समय जब उनका जबर्दस्त एक्सीडेंट हुआ, तब महीने भर इलाज के लिए लंदन में थे। वहां उन्होंने एक आर्टिकल लिखा जो कि अखबारों में पब्लिश हुआ था। जोगी ने लेख में अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहा था कि अब मैं नये तरीके का जीवन जीयूंगा। आगे चलकर उनके तरीकों में कौन सा बदलाव आया उसे समझने की कोशिश में  आज भी कई लोग लगे हुए हैं। 2013 में बेटे अमित जोगी के चुनाव जीत जाने के बाद जोगी जी ने कहा था कि साल भर सक्रिय राजनीति से दूर रहूंगा। खूब पढ़ूंगा-लिखूंगा तथा धर्म और अध्यात्म को और करीब से समझूंगा। इस काम के लिए उन्होंने अपने बंगले के खाली पड़े हिस्से में एक बड़े हाल का निर्माण करवाया। वहां पर एक बार पद्मश्री ख्याति प्राप्त भारती बंधु का भजन भी हुआ, जिसमें जोगी और उनके करीबी समर्थक झुमते नज़र आए थे। बाद में ना जाने हालात कैसे बदलते चले गए धर्म और अध्यात्म का सिलसिला बीच में ही थम गया और जोगी 2014 का लोकसभा चुनाव महासमुंद सीट से लड़ गए, जिसमें उन्हें भाजपा प्रत्याशी चंदूलाल साहू के हाथों पराजय मिली। ये वही अनोखा लोकसभा चुनाव था जिसमें भाजपा प्रत्याशी को मिलाकर दर्जन भर चंदूलाल महासमुन्द सीट से चुनावी मैदान में थे जिसकी चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हुई थी। जो हो, जोगी अभी न तो राजनीति से रिटायर होने वाले हैं और न ही उन्हें अभी धर्म और अध्यात्म के लिए समय मिल पाएगा। नई जनता कांग्रेस की जमीन मजबूत करने दिन रात लगे जो रहना पड़ेगा।

सुर्खिंयों में राय
आर. के. राय वो शख्स हैं जो ढाई साल के विधायक कार्यकाल में लगातार सुर्खियों में हैं। इस कार्यकाल में शायद ही कोई दूसरा नया विधायक हो, जिसकी चर्चा मीडिया में इतनी होती रही हो। राय पुलिस अफसर की नौकरी से इस्तीफा देकर राजनीति में आए। काफी विरोध होने के बाद भी न सिर्फ कांग्रेस की टिकट लेने में कामयाब रहे, बल्कि विधायक चुनाव भी जीते। उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का ब्लाइंड सपोर्टर माना जाता है। राय को जब लगता है तो वे बड़े नेताओं पर निशाना साधने से भी नहीं चूकते। जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव के समय कांग्रेस आलाकमान के सबसे ज्यादा विश्वसनीय माने जाने वाले मोतीलाल वोरा जैसे नेता पर राय गंभीर आरोप लगाने से पीछे नहीं रहे थे, जिसके कारण वे कुछ समय कांग्रेस से निलंबित भी रहे। अब वे खुले तौर पर यह कहते नज़र आ रहे हैं- हां मैं अजीत जोगी के साथ हूं, जिसे जो करना है कर ले। बताते हैं राय व्दारा कही गई यह बात कांग्रेस राष्ट्रीय महासचिव एवं प्रदेश प्रभारी बी.के. हरिप्रसाद के कानों तक पहुंच चुकी है। राय को लेकर करना क्या है, बड़े नेता अभी इस पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए हैं। राय दावे के साथ कहते हैं- मैं जो भी कहता हूं या करता हूं पूरे होश हवाश के साथ करता हूं। अध्ययन में जुटे रहना मेरी प्रवृत्ति है। विधानसभा चुनाव कैसे नये अंदाज में लड़ा जाए इस पर चिंतन मनन करने मैंने राजस्थान की यात्रा की थी। राजस्थान जाकर समझने की कोशिश की कि वहां के राजे-महाराजे कौन सी रणनीतियों पर चलते हुए अपने शत्रुओं को निपटाते थे। राजस्थान में हासिल किए गए अनुभव मुझे छत्तीसगढ़ में काम आ रहे हैं।

रायपुर एयरपोर्ट अब नहीं नंबर वन
छत्तीसगढ़ राज्य में ऐसा कई बार देखने में आया है कि बड़ी घोषणाएं, बड़े काम या बड़ी उपलब्धि ज्यादा समय तक टिके नहीं रह पाती। कुछ दिनों पहले जो रायपुर एयरपोर्ट सुविधाओं में नंबर वन था खिसककर नंबर दो पर आ गया। एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया की ताजा सर्वे रिपोर्ट तो कुछ ऐसा ही बयां कर रही हैं। ये वही रायपुर एयरपोर्ट है जहां पिछले अप्रैल महीने में विमान से उतरने के बाद एक्ट्रेस दीपा सही ने कहा था वॉव... ऐसा एयरपोर्ट तो गोवा का भी नहीं है। उस दौरान दीपा के फिल्म डायरेक्टर पति केतन मेहता भी साथ थे। कभी बायो-डीजल (रतनजोत) के इस्तेमाल पर शासन की ओर से बढ़-चढ़कर घोषणाएं हुई थीं। आगे जाकर यह काम पिछड़ गया। घोषणा तो यहां तक हुई थी कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की कार बायो-डीजल से चलेगी। कुछ दिन चली, फिर बंद हो गई। इसी तरह आंशिक शराब बंदी में भी प्रदेश पिछड़ गया। सरकार ने घोषणा की थी कि पूर्ण तो नहीं पर आंशिक शराब बंदी की तरफ हमारे कदम बढ़ रहे हैं। कदम कहां तक बढ़े थे ये तो पता नहीं, गांव-गांव हर शाम जाम ज़रूर छलक रहे हैं।

बार और चीतल रेस्टॉरेंट
भाजपा के चिंतन शिविर के कारण बारनवापारा अभ्यारण्य पिछले दिनों लगातार चर्चा में रहा। इस अभ्यारण्य के साथ कुछ अलग ही तरह की बातें जुड़ी हुई हैं। शिकार पर प्रतिबंध होने के बावजूद आए दिन बारनवापारा अभ्यारण्य में चीतल व भालुओं के शिकार की खबरें सामने आती रहती हैं। इंटरनेट के इस युग में आजकल नाम से लेकर काम तक शार्ट में होने लगा है, इसलिए बारनवापारा बार कहलाने लगा है। बारनवापारा में पर्यटकों की सुविधा के लिए पर्यटन विभाग ने एक रेस्टॉरेन्ट भी खोल रखा है, जिसका नाम भी पता नहीं किस बुद्धिमान ने चीतल रेस्टॉरेन्ट रख दिया है। चीतल रेस्टॉरेन्ट यह नाम कानों में पड़ता है तो पर्यटकों के मन में कुछ अजीब सा बोध होता है। यहां तक कि चीतल रेस्टॉरेन्ट का पूरा स्टाफ भी इस नाम को लेकर खुश नहीं है। लेकिन अफसरों के आगे इसे गलत ठहराकर कौन अपनी नौकरी खतरे में डाले। बार और चीतल रेस्टॉरेन्ट ये दोनों शब्द कितने ही पर्यटकों की नापसंदगी बने हुए हैं।
  


राजधानी में दनादन गोलियां
राजधानी रायपुर में पंद्रह दिनों के भीतर तीन लोगों पर बंदूक से प्राणघातक हमला हुआ। एक बाल-बाल बचा और दो लोगों की जान चली गई। राजधानी में कानून व्यवस्था की तो मानो लगातार धज्जियां उड़ रही हैं। पुलिस का डर भय रहा नहीं। कोई दिन में गोली चला रहा है तो कोई शाम में। घर लौट रहे व्यापारी की रात में गोली मारकर हत्या की गई उस समय भी कोई ज्यादा वक्त नहीं हुआ था। चौराहे में लगे ट्रैफिक सिग्नल पर पुलिस वाले सिर्फ टाइम पास करते दिखते हैं। गौरव पथ और एयरपोर्ट जाने वाले वीआईपी रोड पर खुले आम यातायात कानून का उल्लंघन होते रहता है। व्यस्ततम ट्रैफिक के समय में भी बीच रास्तों पर रईस घरों की बिगड़ैल औलादें बाइक रेस करते नज़र आ जाती हैं। यहां तक कि शंकर नगर मार्ग जहां मंत्रियों के बंगले हैं और पुलिस महानिरीक्षक का दफ्तर है वहां भी बाइक रेस का नज़ारा सुबह शाम दिख जाता है। जहां सरकार बैठी है उस शहर का जब ये हाल है फिर बाकी का तो भगवान ही मालिक है। 


गुरुवार, 30 जून 2016







`आपके दीवाने', `अगर तुम ना होते' एवं `दरिया दिल' जैसी सुपरहिट फ़िल्मों के प्रोड्यूसर एवं `राजा जी', `दुलारा', `छोटे सरकार', `स्वर्ग यहां नर्क यहां' व `जैसी करनी वैसी भरनी' जैसी चर्चित फिल्मों के डायरेक्टर विमल कुमार जी से उनके मुम्बई स्थित निवास में खास मूलाकात...
पिछले 16 वर्षों से लगातार छत्तीसगढ़ी सिनेमा पर अखबारों व पत्रिकाओं में लिखते रहने के लिए मुझे तेलुगु सिनेमा के जाने माने प्रोड्यूसर - डायरेक्टर बी. रामाकृष्ण रेड्डी तथा एक्टर राम कार्तिक के हाथों सम्मानित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ... यह कार्यक्रम आंध्रा एसोसिएशन रायपुर द्वारा आयोजित था...
छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस
अनिरुद्ध दुबे
छत्तीसगढ़ की राजधानी में इन दिनों भारी राजनीतिक हलचल है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कांग्रेस से अलग होते ही एक के बाद एक नये समीकरण बनते चले जा रहे हैं। शक्ति प्रदर्शन का खूब दौर चल रहा है। अलग पार्टी बनाने की घोषणा करने के बाद अजीत जोगी ने अपने राजनीतिक आयोजन के लिए सबसे पहले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के गांव ठाठापुर को चुना। जोगी केम्प ने यह संदेश देने की कोशिश की कि देखो हमने शेर को उसकी मांद पर जाकर ललकारा है। वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने हम किसी से कम नहीं का मैसेज देते हुए उस मरवाही क्षेत्र में सम्मेलन रखवाया, जिसे जोगी परिवार का चुनाव क्षेत्र माना जाता रहा है। अजीत जोगी मरवाही से तीन बार विधायक रहे हैं और वर्तमान में वहां से उनके बेटे अमित जोगी विधायक हैं। मरवाही के सम्मेलन में सबसे ज्यादा बढ़-चढ़कर पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. चरणदास महंत ने हिस्सा लिया। अजीत जोगी के कांग्रेस छोड़ने के बाद डॉ. महंत के चेहरे पर इन दिनों संतोष का भाव साफ देखा जा सकता है। महंत के करीबी मित्र कहते हैं कि दाउ जी लोकसभा चुनाव में हार वाले दिन भूले नहीं हैं। वो भला भूलें भी तो कैसे कोरबा लोकसभा सीट पर उन्हें कांग्रेस के तथाकथित उन चेहरों ने निपटाया था, जिनकी भाजपा प्रत्याशी बंशीलाल महतो के साथ फोटो वायरल हुई थी। यह सब वाकया सामने आने के बाद महंत ने अपने दर्द बयां करते हुए कहा भी था कि ऐसा चुनाव मैंने अपनी जिन्दगी में पहले कभी नहीं देखा। बहरहाल अजीत जोगी के कांग्रेस से अलग होने के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल से लेकर नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव, डॉ. चरणदास महंत एवं रविन्द्र चौबे जैसे सीनियर लीडरों ने ढाई साल के बाद वाली भूमिका को लेकर सोच विचार शुरु कर दिया है। ढाई साल बाद विधानसभा चुनाव जो है।

अब क्या कहेंगे मंत्री कश्यप
16 जून को प्रदेश में स्कूलें खुल गईं। नये शिक्षा सत्र के शुरु होते ही मीडिया के माध्यम से स्कूली बच्चों के संघर्ष की दास्तान जो सामने आई है उसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है। दंतेवाड़ा जिले के पाहुरनार गांव की एक स्कूली छात्रा की तस्वीर सामने आई, जिसमें वह इंद्रावती नदी को पैदल पार करते हुए स्कूल पढ़ने जा रही है। यह स्थान बस्तर का है और खुद स्कूली शिक्षा मंत्री केदार कश्यप बस्तर से हैं। धुर नक्सल प्रभावित बस्तर में और भी ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां बच्चों को स्कूल तक पहुंचने कठिन यात्रा करनी पड़ती है। विधानसभा में स्कूली शिक्षा व्यवस्था को लेकर जब भी कांग्रेसी विधायकों की तरफ से हमला होता है, मंत्री केदार कश्यप यह कहते हुए बचाव करते नज़र आते हैं कि विपक्ष नहीं चाहता कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शैक्षणिक सुविधाओं का विस्तार हो। बहरहाल बस्तर के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा सुविधाओं का क्या हाल है उसकी चुगली वह फोटो करती नज़र आ रही है जिसमें बच्ची मगरमच्छों से भरी इंद्रावती नदी पार कर स्कूल पढ़ने जा रही है।

रे का हौसला
रिटायर्ड आईएएस अफसर बीकेएस रे के हौसले की भी दाद देनी होगी। रे फेस बुक पर यह टिप्पणी कर गए कि प्रदेश की भाजपा सरकार भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबी हुई है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बीच अंदरुनी सांठगांठ है। प्रदेश की जनता इन दोनों के मंसूबों को सफल नहीं होने देगी। फेस बुक पर रे की यह टिप्पणी सामने आते ही भाजपा नेताओं एवं जोगी केम्प के लोगों की तरफ से उन पर जवाबी हमला शुरु हो गया है। न सिर्फ राजनीतिज्ञ अपितु गैर राजनीतिज्ञ लोग भी वजह तलाशने में जुटे हैं कि आखिर रे के ऐसी बातें पोस्ट करने के पीछे क्या वजह हो सकती है। उल्लेखनीय है कि रे अपर मुख्य सचिव पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी गिनती बेहद काबिल अफसरों में हुआ करती थी। जब स्कूली शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव पद की जिम्मेदारी उनके पास थी, उन्होंने बारहवीं बोर्ड परीक्षा में फर्जी तरीके से मेरिट लिस्ट में प्रथम स्थान आने वाली छात्रा पोरा बाई का भंडाफोड़ किया था। राजधानी रायपुर के ही एक बड़े अखबार के प्रथम पृष्ठ पर इस आशय की खबर के साथ जोरदार हैडिंग लगी थी- ‘’पोरा बाई निकली मुन्ना भाई‘’ रे ने डॉ. रमन सिंह व अजीत जोगी पर जो निशाना साधा है, उस पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल समेत उनकी पार्टी के अन्य नेता उनकी प्रशंसा करते नहीं थक रहे हैं।

कैसे झंडा ऊंचा रहे हमारा?
राजधानी रायपुर के तेलीबांधा तालाब में बने मरीन ड्राइव पर देश का सबसे ऊंचा तिरंगा झंडा लगवाने का दावा करते हुए प्रदेश शासन में बैठे लोग व रायपुर नगर निगम के कर्ता-धर्ता
खुद की पीठ थपथपाते नहीं थक रहे थे। पखवाड़े भर के भीतर दो बार आए जबरदस्त तूफान से जिस तरह सबसे बड़े इस तिरंगे को क्षति पहुंची उस पर सत्ताधारियों की खूब आलोचना हो रही है। रोजाना मरीन ड्राइव में घूमने फिरने आने वाले कितने ही लोगों का कहना है कि शासन व प्रशासन ने मरीन ड्राइव के आसपास पेड़ पौधे लगाकर व मकानों पर रंग बिरंगे चित्र बनवाकर साज सज्जा की वहां तक तो ठीक था, लेकिन  लाखों खर्च कर सबसे बड़ा तिरंगा लहराने के पीछे कारण समझ से परे है। यही लाखों रुपये मरीन ड्राइव के आसपास ही किसी दूसरे जन हित से जुड़े कार्यों में खर्च किए जाते तो शासन व प्रशासन की वाहवाही ही होती।


झूमता छत्तीसगढ़
इन दिनों उड़ता पंजाब फिल्म की खूब चर्चा है। सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर अड़ंगा क्या लगाया, इसका नाम हर किसी की जुबां पर चढ़ गया। पंजाब इस समय जिस बुरी तरह नशे की गिरफ्त में है, वही `उड़ता पंजाब फिल्म का विषय है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे पंजाब में छोटे से लेकर बड़े तक हेरोइन व ब्राउन शुगर समेत अन्य नशीले पदार्थों की गिरफ्त में हैं। नशे की गिरफ्त में तो छत्तीसगढ़ भी है। छत्तीसगढ़ के शहर से लेकर गांवों तक में खूब शराबखोरी हो रही है। शाम को शराब दुकानों में ठीक वैसी ही भीड़ नजर आती है जैसा कि कभी सिनेमाघरों में किसी नई फिल्म के प्रदर्शन के समय टिकट खिड़की में नज़र आया करती थी। इस समय छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी भाषा में खूब फिल्में बन रही हैं। छॉलीवुड के एक प्रोड्यूसर डायरेक्टर की राय है कि जब पंजाब में ड्रग्स की लत को लेकर `उड़ता पंजाब नाम से फिल्म बन सकती है तो छत्तीसगढ़ में हो रही भारी शराबखोरी को लेकर `झूमता छत्तीसगढ़ नाम से फिल्म तो बनाई ही जा सकती है।